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क्यों ऐसा मन में आता है

जब भी देखूं कोई ठिठुरता
मन में बस ऐसा आता है
ढापूं उसको बन कर कम्बल
सोच के मन खुश हो जाता है
मत बनूं बादाम या पिस्ता
मूंगफली ही मैं बन जाऊं
जी में तो यह भी आता है
कड़क चाय बन उनको भाऊं
बन कर थोड़ी धूप सुहानी
उनके आंगन में खिल जाऊं
गरम गरम कर उनके तन को
मन ही मन थोड़ा मुस्काऊं
जहां न चूल्हे जल पाते हों
उन चूल्हों की आग बनूं मैं
कयों ऐसा मन में आता है
रोटी. सब्जी. दाल बनूं मैं
जी चाहता है. जी चाहता है
जिनके पास नहीं हैं टी वी
उनके घर टी वी बन जाऊं
पढ़ना लिखना जिन्हें न आता
पढ़ना लिखना मैं बन जाऊं।
जी चाहता है. जी चाहता है।
कम्प्यूटर बन उनका जीवन
कम्प्यूटर वालों सा कर दूं
जी चाहता है बन कर खुशियां
सब खाली घर उनसे भर दूं।
जी चाहता है. जी चाहता है।

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