डाँट या मार से नहीं, प्यार से सुधर सकते हैं बच्चे, यह रहे कुछ टिप्स

राहुल आज फिर स्कूल की कॉपी घर भूल आया। उसके जूते भी बिना पॉलिश के थे। इस वजह से टीचर का गुस्सा सातवें आसमान पर था। सिर्फ इस वजह से राहुल की पूरे क्लास के सामने पिटाई हुई। अकसर क्लास में कई छात्रों की हरकतें एक शिक्षक में चिढ़ पैदा कर देती हैं। पढ़ाई के दौरान बातचीत करना या छोटी−छोटी ऐसी हरकतों से शिक्षक परेशान हो जाते हैं। ऐसे में शिक्षक अपना गुस्सा छात्रों पर उतारते हैं। शिक्षकों की नाराजगी कई तरह से निकलती है, जैसे बच्चों को चॉक फेंककर मारना, गाली देना या फिर छड़ी से पिटाई करना। ये हरकतें बच्चों के मन पर गलत असर डालती हैं। पिटाई के डर से वह स्कूल नहीं आना चाहता। अपने टीचर से बात करना नहीं चाहता। अकसर स्कूलों में बच्चों को शारीरिक प्रताड़ना दी जाती है, जिससे बच्चों का मन आहत होता है। यों तो स्कूलों में बच्चों की पिटाई पर रोक लग चुकी है। मगर छोटे शहरों और कस्बों में यह अब भी होती है।
चंड़ीगढ़ में 2002 में ऐसी ही घटना हुई, जहां पर शिक्षक ने बच्चों को सजा के तौर पर उनके बाल काट दिए। बच्चों की गलती यही थी कि शिक्षक के कई बार कहने पर भी बच्चों ने बाल नहीं कटवाए थे। स्कूलों में पिटाई पर पाबंदी के बावजूद आज भी कहीं से भी ऐसी खबरें आ ही जाती हैं। आज भी बच्चों को शारीरिक सजा देना और उनके साथ गाली−गलौज का सिलसिला बंद नहीं हुआ है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि बच्चों को सरेआम पूरी क्लास के सामने धमकाने और चेतावनी देने से शिक्षक आज भी बाज नहीं आ रहे।
कहते हैं मां के बाद बच्चों का दूसरा गुरु शिक्षक ही होता है। उन्हें बच्चों की जिम्मेदारी इसीलिए दी जाती है ताकि वे उन्हें सही दिशा दे सकें, पर जब शिक्षक मार−पीट और सजा देने पर उतर जाए तो बच्चे के मन में शिक्षक के प्रति सम्मान खत्म होता जाता है। कई स्कूलों में बच्चों को सजा देने पर नियम हैं। अगर किसी बच्चे के साथ मारपीट या उस पर गुस्सा दिखाया जाता है, तो यह सजा उसके मन पर गलत असर डालती है। इसका नतीजा नकारात्मक निकलता है और बच्चा धीरे−धीरे जिद्दी बनता चला जाता है। शिक्षक का काम है बच्चों की गलतियों पर समझबूझ से काम लेना और अपने आप पर संयम रख बच्चों को सही तरीके से समझाना।
ऐसा नहीं है कि इस समस्या का कोई हल नहीं है। बजाय बच्चों को सजा देने के शिक्षक उनसे यह जानने की कोशिश करें कि वे ऐसा क्यों कर रहे हैं? कई बार बच्चों में आत्मविश्वास की कमी होती है या फिर वे खुद को उपेक्षित महसूस करते हैं जिससे वे शिक्षक की बात पर भी ध्यान नहीं देते। शिक्षक इस मामले में बच्चों के माता−पिता से बात कर सकते हैं बजाय इसके कि वे उसकी पिटाई करें या कोई और सजा दें।
बच्चों को सुधारने के और भी कई तरीके हैं। जरूरी नहीं कि हर बार छड़ी उठाई जाए। बच्चों के साथ उनकी पसंद का काम करते हुए उन्हें समझाया जा सकता है। खेलने का समय थोड़ा कम कर उनसे बात की जा सकती है। अगर किसी बच्चे ने अपना गृहकार्य पूरा न किया हो, तो उसे स्कूल में खाली समय में इसे करवाया जा सकता है। टीचर चाहे तो बच्चों के साथ बैठकर उन्हें उनका काम करवा सकते हैं। इस तरह बच्चों के कोमल मन में शिक्षक के लिए आदर और सम्मान आएगा। छोटी सी सजा बच्चों को मानसिक रूप से आहत नहीं करती अगर यही सजा बड़ी बन जाए तो उनके दिल में अपने टीचर के लिए नफरत हो जाएगी।
शिक्षक चाहें तो बच्चों को अनुशासित करने के लिए कुछ सकारात्मक कदम उठा सकते हैं। जैसे अगर कोई बच्चा कक्षा में अनुशासन का पालन नहीं करता तो उसे ब्लैक स्टार दें और जो बच्चा अनुशासन का पालन करता है, उसे स्टार दें, ताकि बच्चे के मन में सकारात्मक सोच पैदा हो। कक्षा के सबसे अनुशासित बच्चे को हफ्ते के आखिरी में कोई तोहफा दिया जाए ताकि और बच्चे भी अच्छी सीख लें। इस मामले में बच्चों के माता−पिता की भी मदद जरूर लें।

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