परीक्षा का भूत (कहानी)

सोनू कक्षा 9 का विद्यार्थी था। वह हर रोज स्कूल जाता और मन लगाकर पढ़ता था। सोनू की कक्षा के सभी विद्यार्थी व उसके मित्र चीकू और रोहन भी पढ़ाई में सोनू का लोहा मानते थे। मित्र चीकू तो किसी भी विषय में कभी भी कोई परेशानी हो तुरंत सोनू के पास पहुंच जाता था और सोनू उसकी कठिनाई दूर कर देता था। परीक्षाओं से पहले सोनू ही था जिसे घेर के उसके सब सहपाठी अपनी-अपनी कठिनाईयां दूर करते थे।  सालभर तो सोनू स्कूल में सबका हीरो बना रहता था, लेकिन उसके साथ दिक्कत यह थी कि परीक्षा में प्रश्नपत्र सामने आते ही उसे न जाने क्या हो जाता। उसे लगता था कि जैसे वह सब कुछ भूल गया है और इसका परिणाम होता कि परीक्षा में आए प्रश्नों को वह ठीक से हल नहीं कर पाता था, इस कठिनाई के चलते परीक्षाओं में हमेशा वह अपने सहपाठियों से कम नंबर ला पाता था।

उधर सोनू के दोस्तों को अक्सर यही कहते सुना जाता था कि सोनू की ही मदद से वह पास हुए हैं पर, सोनू था कि कई बार तो उसके साथ परीक्षाओं में ऐसा भी होता कि परीक्षा हॉल से बाहर जिन प्रश्नों को वह अपने मित्रों को सिखाता वही प्रश्न परीक्षा में हल करने में उससे चूक हो जाती। सोनू परीक्षा के वक्त आने वाली इस दिक्कत से बहुत परेशान था, आलम यह था कि अब परीक्षा उसे किसी भूत की तरह लगने लगी थी। एक दिन सोनू ने अपनी यह कठिनाई अपने पापा को बताई तो सोनू की यह बात सुनकर उसके पापा भी हैरान थे। तभी दरवाजे की घंटी बजी। सोनू ने दरवाजा खोला, सोनू के पापा के दोस्त अंकल प्रवीण उनके घर आए थे। सोनू के पापा ने दोस्त प्रवीण से हाथ मिलाया और उन्हें बैठने को कहा। प्रवीण मनोवैज्ञानिक थे। बातों ही बातों में सोनू के पापा ने दोस्त प्रवीण को सोनू की परेशानी कही।  दोस्त प्रवीण ने जब सोनू की परेशानी सुनी तो उन्होंने सोनू को अपने पास बुलाया और कुछ देर उससे काफी बातें कीं। सोनू से बात करके अंकल प्रवीण पहचान गए थे कि आखिर सोनू की परेशानी क्या है। अंकल ने सोनू को कहा- ‘‘बेटे सोनू! अपने अंकल को चाय नहीं पिलाओगे।’’ सोनू ने कहा जरूर अंकल! और वह मम्मी के पास चाय बनवाने चला गया। 

 दोस्त प्रवीण ने सोनू के पापा को बताया कि सोनू के दिक्कत कुछ नहीं बस उसे परीक्षा का फोविया है। वह हमेशा सबसे आगे रहना चाहता है और अंदर ही अंदर उसे डर भी रहता है कि परीक्षा में कहीं कुछ उससे नहीं बना तो दोस्तों के सामने वह कम न आंका जाए, बस इसी फोविया के चलते उसका कांफिडेंस (विश्वास) परीक्षा में गड़बड़ा जाता है और वह सब आते हुए भी परीक्षा में कुछ गड़बड़ कर आता है। सोनू के पापा ने कहा- अब ऐसा क्या किया जाए कि सोनू के साथ ऐसा न हो? दोस्त प्रवीण ने बताया कि कुछ ज्यादा करने की जरूरत नहीं है बस आप मुझे चार इलायची दो काम बन जाएगा। सोनू के पापा ने दोस्त प्रवीण को चार इलायची दे दीं। 

सोनू चाय लेकर आया तो प्रवीण अंकल ने सोनू को अपने पास बैठाया और उसे वह इलायचियां देते हुए बोले-सोनू बेटे! इन इलायचियों को संभाल कर रखना, इन इलायचियों में मैंने एक मंत्र रखा है, अब जब भी कोई भी परीक्षा हो इन इलायचियों को अपने साथ ले जाना, इससे तुम्हें परीक्षा में सारे प्रश्न आसानी से सही-सही बन जाएंगे।  सोनू ने इलायचियां अपने पास रख लीं। परीक्षाएं शुरू हो चुकीं थीं सोनू हमेशा उन चार इलायचियों को परीक्षा में अपने साथ ले जाता। वह होशियार तो था ही। अब इलायचियों के पास होने की वजह से उसे परीक्षा देने में कोई कठिनाई नहीं हुई। वह हमेशा हर परीक्षा में उन इलायचियों को अपने पास रखता और अब वह हर परीक्षा में अव्वल आने लगा था।  सोनू बारहवीं कक्षा में आ गया था। उसकी बोर्ड की परीक्षाएं चालू हो गईं थीं, सोनू ने अपने सारे प्रश्नपत्र अच्छी तरह से निपटाए। अंतिम पेपर देने के बाद उसने जब अपने स्कूल यूनिफार्म के पेंट की जेब देखी तो उसे इलायचियां वहां नहीं मिली। हड़बड़ाए से सोनू ने अपनी मम्मी को कहा मेरे स्कूल यूनिफार्म के पेंट की जेब में चार इलायचियां थीं, पता नहीं कहां गईं। सोनू की मां अपनी याद्दाश्त पर जोर देती हुई बोलीं-अच्छा! तुम उन इलायचियों की बात तो नहीं कर रहे जो मैंने तुम्हारी परीक्षा शुरू होने के पहले तुम्हारी पेंट के साथ धो दीं थीं और गीली हो जाने की वजह से उन्हें जेब से हटा दिया था।  मां की बात सुनकर सोनू चिंतित हो गया, बोला- हे भगवान। अब पता नहीं मेरा रिजल्ट कैसा आएगा, उन इलायचियों की वजह से तो मैं अच्छे नंबर ला पा रहा था।  कुछ समय बाद वह दिन भी आ गया जब सोनू का रिजल्ट घोषित होना था। सोनू सुबह से ही परेशान सा इधर-उधर घूमता रिजल्ट आने का इंतजार कर रहा था। ठीक 12 बजे उसका रिजल्ट घोषित हुआ। सोनू ने जब इंटरनेट पर अपना रिजल्ट देखा तो खुशी से उछल पड़ा वह फर्स्ट डिवीजन में पास हुआ था और स्कूल में बोर्ड परीक्षा की लिस्ट में उसका नाम सबसे ऊपर था।  सोनू ने बारहवीं बोर्ड में फर्स्ट डिवीजन से पास होने की मिठाई सबको खिलाई। मिठाई देने जब वह प्रवीण अंकल के पास पहुंचा तो उन्हें मिठाई देते हुए बोला- ‘‘सॉरी अंकल! मैं हमेशा आपकी दी हुई इलायचियां अपने पास रखता और फर्स्ट आता था लेकिन इस बार मैंने उन इलायचियों को खो दिया और अपने साथ परीक्षाओं में नहीं ले जा पाया। पर, अंकल मिठाई खाइये आप सभी के आशीर्वाद से मैं इस बार भी फर्स्ट आया।’’ प्रवीण अंकल ने हंसते हुए सोनू के साथ मिठाई खाई और बोले- ‘‘सोनू! मैंने तुम्हें जो इलायचियों दी थीं उनके लिए दुःखी होने की जरूरत नहीं हैं, उन इलायचियों में कोई मंत्र नहीं था। यह साधारण इलायचियां थीं जो मैंने तुम्हारे पापा से ही ली थीं। उनमें मंत्र होने का तुमसे बस इसलिये कहा था ताकि तुम्हारे मन से परीक्षा का भूत गायब किया जा सके। सोनू! परीक्षा कोई भूत नहीं बल्कि हमने साल भर जो पढ़ा उसकी जांच-परख है, यदि तुमने वह सब पढ़ा-लिखा है तो परीक्षा को भूत बनाने या किसी को दिखाने के लिए नहीं अपने कांफिडेंस (विश्वास) के लिए देना चाहिए। यह परीक्षा ही है जो हमें आगे और आगे बढ़ते रहने के लिए प्रेरित करती है।’’ सोनू को अंकल की बात समझ आ गई थी। परीक्षा का डर अब उसके मन से हमेशा के लिए निकल गया था और अब वह मन लगाकर पढ़ते हुए विश्वास के साथ परीक्षाएं देकर हमेशा आगे बढ़ता रहा। 


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