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शनि जयंती: कलयुग के न्यायाधीश हैं शनि देव

शनि जयंती: कलयुग के न्यायाधीश हैं शनि देव

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शनिदेव का नाम आते ही अक्सर लोग सहम जाते हैं या फिर असहज हो जाते हैं। उनके प्रकोप से खौफ खाने लगते हैं। शनि को क्रूर ग्रह माना जाता है लेकिन वास्तव में ऐसा है नहीं। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार शनि न्यायधीश या कहें दंडाधिकारी की भूमिका का निर्वहन करते हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार शनि देव सेवा और कर्म के कारक हैं।शनि देव न्याय के देवता हैं, उन्हें दण्डाधिकारी और कलियुग का न्यायाधीश कहा गया है। शनि शत्रु नहीं बल्कि संसार के सभी जीवों को उनके कर्मों का फल प्रदान करते हैं। वह अच्छे का अच्छा और बुरे का बुरा परिणाम देने वाले ग्रह हैं शनिदेव।पौराणिक मान्यताओं के अनुसार ज्येष्ठ अमावस्या पर शनि देव का जन्म हुआ था। इसलिए ज्येष्ठ अमावस्या को शनि जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। इस दिन शनिदेव की पूजा-अर्चना कर उनको प्रसन्न किया जाता है। अगर कोई शनिदेव के कोप का शिकार है तो रूठे हुए शनिदेव को मनाया भी जा
दूसरा बड़ा मंगल, घरों से लगेंगे बाबा के जयकारे

दूसरा बड़ा मंगल, घरों से लगेंगे बाबा के जयकारे

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धर्म (DiD News): जेठ का दूसरा बड़ा मंगल भी सन्नाटे में बीतेगा। लॉकडाउन 4 शुरू होने की घोषणा के साथ ही यह तय हो गया कि फिलहाल हनुमान मन्दिरों के कपाट श्रद्धालुओं के लिए बंद ही रहेंगे और लोग अपने घरों में ही रहकर हनुमान जी की पूजा अर्चना करेंगे।अलीगंज के नए हनुमान मन्दिर के कार्यालय अधीक्षक राकेश दीक्षित ने बताया कि हनुमान जी महाराज का अभिषेक, श्रृंगार केवल मंदिर के पुजारी करेंगे। वहां भोर की आरती सुबह 6 बजे और शाम की 7:30 बजे होगी। खीर लड्डू, पूड़ी-कचैड़ी का भोग लगाया जाएगा। सुबह 8 बजे सुंदरकांड का पाठ किया जाएगा।हनुमान सेतु मन्दिर: आस्था के प्रमुख केन्द्र हनुमान सेतु मन्दिर के बड़े पुजारी भगवान सिंह विष्ट ने बताया कि मंदिर को बिजली की झालरों से सजाया है। पूजे जाएंगे वानर: डालीगंज के बंदी माता मंदिर में महंत पूजा पुरी द्वारा हनुमान जी की पूजा-अर्चना होगी। बंदरों को चना और केला खिलाया
मां भद्रकाली को समर्पित है यह उपवास

मां भद्रकाली को समर्पित है यह उपवास

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ज्येष्ठ माह में कृष्ण पक्ष की एकादशी को अचला एकादशी, अपरा एकादशी, भद्रकाली एकादशी और जलक्रीड़ा एकादशी नाम से जाना जाता है। यह उपवास अत्यधिक पवित्र है और मोक्ष प्राप्त करने का उत्तम माध्यम माना जाता है। यह दिन मां भद्रकाली की पूजा के लिए सबसे अनुकूल है। उड़ीसा में इस दिन को जलक्रीड़ा एकादशी के रूप में मनाया जाता है। यह भगवान जगन्नाथ को समर्पित है। अतीत और वर्तमान में हुए पाप को दूर करने के लिए इस व्रत का पालन करना चाहिए।मान्यता है कि ज्येष्ठ माह में कृष्ण पक्ष एकादशी को माता भद्रकाली प्रकट हुईं। यह भी माना जाता है कि प्रभु श्रीराम से हनुमान जी की मुलाक़ात भी ज्येष्ठ माह में ही हुई थी। इस एकादशी पर उपवास कर भगवान विष्णु की आराधना करने से समस्त पापों से मुक्ति मिलती है। इस व्रत के प्रभाव से प्रेत बाधा कभी परेशान नहीं करती। घर में धन-धान्य की कमी नहीं होती है। एकादशी के दिन सुबह नित्यकर्म के बाद
भगवान विष्णु, तीर्थयात्रियों के आकर्षण का केंद्र

भगवान विष्णु, तीर्थयात्रियों के आकर्षण का केंद्र

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भगवान वेंकटेश्वर को विष्णु देव का अवतार माना जाता है। वेंकट पहाड़ी के स्वामी होने की वजह से भगवान विष्णु को वेंकटेश्वर कहते हैं। सात पहाड़ों का भगवान भी कहा जाता है भगवान विष्णु को। तिरुपति बालाजी मंदिर में साल के 12 महीनों में एक भी माह ऐसा नहीं गुजरता है कि जब भगवान वेंकटेश्वर के दर्शन करने के लिए भक्तों की कतारें नहीं लगी हों। भगवान वेंकटेश स्वामी को संपूर्ण ब्रह्माण्ड का स्वामी माना जाता है। भगवान विष्णु को समर्पित यह मंदिर आन्धप्रदेश के चित्तूर जिले के तिरुपति में हैं। यह भारत के प्रसिद्ध तीर्थस्थलों में से एक है। तिरुपति बालाजी मंदिर के बारे में एक मान्यता है कि भगवान विष्णु ने यहां कुछ समय के लिए विश्राम किया था। तिरुमला के पुष्करणी नाम के तालाब के किनारे भगवान विष्णु ने निवास किया था। मंदिर के पास लगे हुए इस पुष्करणी पवित्र जलकुण्ड के पान का उपयोग सिर्फ मंदिर के पूजन और सेवाकार्यों
अपरा एकादशी

अपरा एकादशी

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हिन्दू धर्म में एकादशी का खास महत्व है। मनुष्य अपने पाप की मुक्ति और पुण्य पाने के लिए एकादशी का उपवास करते हैं। भगवान विष्णु का प्यार और स्नेह के इच्छुक परम भक्तों को दोनों दिन एकादशी व्रत करने की सलाह दी जाती है। आने वाली 18 मई को अपरा एकादशी है। मान्यता है कि अपरा एकादशी को व्रत रखने से प्रेम योनि से मुक्ति से मिलती है और भक्त की सभी परेशानियां दूर हो जाती हैं। अपरा एकादशी का व्रत रखने से जीवन में चली आ रही पैसों की परेशानी भी दूर होती है। इतना ही नहीं इस व्रत को करने से जातक अगले जन्म में भी धनी घर में पैदा होता है। ज्येष्ठ महीने की कृष्ण पक्ष के दिन आने वाली एकादशी को अपरा एकादशी कहा जाता है। इस साल यह एकादशी 18 मई दिन सोमवार को पड़ रही है। अपरा एकादशी को भद्रकाली एकादशी, अचला एकादशी और जलक्रीड़ा एकादशी भी कहा जाता है। अपरा एकादशी के दिन व्रत रखने से पुण्य और सम्मान मिलता है।
वट सावित्री व्रत

वट सावित्री व्रत

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हिंदु पंचांग के अनुसार वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या को मनाया जाता है। पति की लंबी आयु के लिए सुहागिनें वट सावित्री व्रत रखती हैं। इस साल यह व्रत 22 मई को है। इस दिन महिलाएं बरगद के पेड़ की पूजा करते हैं। कहते हैं कि इस पेड़ में ब्रह्मा, विष्णु व महेश तीनों देवताओं का वास होता है। इस दिन महिलाएं वट वृक्ष के नीचे बैठकर कथा पढ़ती है और वट वृक्ष को रक्षा सूत्र बांधती है। पूजा के बाद सौभाग्यवती महिला अपनी सास को वस्त्र और श्रृंगार का देकर उसके पैर छूकर आशीर्वाद लेती है। बहुत पहले की बात है अश्‍वपति नाम का एक सच्चा ईमानदार राजा था। उसकी सावित्री नाम की बेटी थी। जब सावित्री शादी के योग्‍य हुई तो उसकी मुलाकात सत्‍यवान से हुई। सत्‍यवान की कुंडली में सिर्फ एक वर्ष का ही जीवन शेष था। सावित्री पति के साथ बरगद के पेड़ के नीचे बैठी थी। सावित्री की गोद में सिर रखकर सत्‍यवान लेटे हुए थे। तभी उन
द्वितीय केदार मद्महेश्वर के खुले कपाट

द्वितीय केदार मद्महेश्वर के खुले कपाट

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धर्म (DiD News): द्वितीय केदार भगवान मद्महेश्वर मन्दिर के कपाट सोमवार को सुबह 11 बजे वैदिक मंत्रोच्चार व पौराणिक रीति रिवाजों के साथ खोल दिए गए हैं। अब छह माह भगवान की पूजा अर्चना मद्महेश्वर में ही होगी। वहीं लॉकडाउन के चलते प्रशासन ने सीमित लोगों को ही धाम जाने की अनुमति दी। सोमवार को सुबह छह बजे डोली गोंडार से रवाना हुई। 10 बजे देवदर्शनी  में पहुंचने के बाद कुछ ही देर में मंदिर परिसर पहुंची। यहां ठीक 11 बजे मन्दिर के कपाट खोल दिए गए। बीते शनिवार को शीतकालीन गद्दी स्थल ओंकारेश्वर मन्दिर उखीमठ से भगवान की चलविग्रह उत्सव डोली उच्च हिमालय क्षेत्र मद्महेश्वर धाम के लिए रवाना हुई थी। प्रथम पड़ाव रांसी व द्वितीय पड़ाव गोंडार में रात्रि विश्राम करने के बाद डोली मद्महेश्वर मन्दिर परिसर में पहुंची। सोमवार को सुबह 5 बजे गोंडार में पुजारी गंगाधर लिंग द्वारा भगवान का अभिषेक, श्रृंगार,भोग एवं पूज
ओंकारेश्वर मंदिर

ओंकारेश्वर मंदिर

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द्वितीय केदार मद्महेश्वर की डोली शनिवार को मद्महेश्वर धाम के लिए प्रस्थान करेगी। वहीं, 11 मई को मन्दिर के कपाट खोल दिए जाएंगे। परंपरा के अनुसार आज ओंकारेश्वर मंदिर से भगवान की डोली अपने पहले पड़ाव राकेश्वरी मन्दिर के लिए प्रस्थान करेगी।वैदिक मंत्रोच्चार के साथ रावल भीमाशंकर लिंग की उपस्थिति में गुरुवार को ओंकारेश्वर के गर्भगृह से भगवान की जागृत भोग मूर्ति को बाहर लाकर सभामंडप में विराजमान किया गया था। इसके बाद पुजारी गंगाधर लिंग द्वारा भगवान की पूजा संपन्न की गई। शुक्रवार को ओंकारेश्वर मंदिर में विश्राम के बाद आज डोली धाम के लिए रवाना होगी। वहीं, लॉकडाउन के मद्देनजर इस दौरान सीमित लोग ही रहेंगे। डोली रांसी के राकेश्वरी मन्दिर में पहुंचेगी। रविवार को रांसी से गोंडार एवं सोमवार को गोंडार से मद्महेश्वर के लिए रवाना होगी। जहां पर प्रात: 11 बजे मंदिर के कपाट खोल दिए जाएंगे।
भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा के लिए तैयारी शुरू

भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा के लिए तैयारी शुरू

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भगवान जगन्नाथ की वार्षिक रथ यात्रा के लिए रथ निर्माण का काम लॉकडाउन के बीच शुक्रवार को शुरू कर दिया गया। यह वार्षिक रथ यात्रा 23 जून से शुरू होनी है। अधिकारियों ने बताया कि जगन्नाथ मंदिर कार्यालय और श्री नहर महल के सामने ग्रैंड रोड पर दोनों ओर स्थित ‘रथ कला’ में निर्माण कार्य जारी है।उन्होंने बताया कि निर्माणस्थल पर अवरोधक लगा दिए गए हैं और प्रशासन के निर्देशानुसार उसे कपड़ों से ढक दिया गया है। सामाजिक दूरी के नियम का पालन किया जा रहा है। ‘रथ कला’ को भी निषिद्ध क्षेत्र घोषित कर दिया गया है।भगवान जगन्नाथ रथ के प्रमुख बढ़ई बिजय महापात्र ने बताया कि लॉकडाउन के दिशा-निर्देशों के तहत रथ का निर्माण किया जा रहा है। सामाजिक दूरी बनाए रखने के नियम का पालन किया जा रहा है और सभी लोग काम के समय मास्क भी पहनते हैं। उन्होंने बताया कि केन्द्र सरकार की ओर से ‘रथ कला’ में निर्माण गतिविधियां शुरू करने की अन
इस पावन व्रत के प्रभाव से बढ़ता है सौंदर्य

इस पावन व्रत के प्रभाव से बढ़ता है सौंदर्य

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वैशाख माह में शुक्‍ल पक्ष की एकादशी को मोहिनी एकादशी का व्रत किया जाता है। इस व्रत को लेकर मान्यता है कि समुद्र मंथन के समय भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण किया था। भगवान ने अपने मोहिनी रूप से असुरों को मोहपाश में बांध लिया और देवताओं को अमृत पान करा दिया था। इसी कारण इस एकादशी को मोहिनी एकादशी कहा जाता है। इस व्रत में सच्चे मन से भगवान विष्णु की अराधना करने से बैकुंठ की प्राप्ति होती है।यह पावन तिथि सभी पापों को हरने वाली है। भगवान विष्णु अपने भक्तों के सभी कष्टों को हर लेते हैं, इसीलिए उन्हें श्री हरि भी कहा जाता है। मोहिनी एकादशी का व्रत रखने से आकर्षण बढ़ता है और बुद्धि का विकास होता है। इस व्रत के प्रभाव से मान-सम्मान की प्राप्ति होती है। सौंदर्य का वरदान मिलता है। इस व्रत के प्रभाव से घर-परिवार में सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है। इस व्रत में भगवान विष्‍णु की पूजा करते समय तुलसी के पत