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वट सावित्री व्रत

वट सावित्री व्रत

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हिंदु पंचांग के अनुसार वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या को मनाया जाता है। पति की लंबी आयु के लिए सुहागिनें वट सावित्री व्रत रखती हैं। इस साल यह व्रत 22 मई को है। इस दिन महिलाएं बरगद के पेड़ की पूजा करते हैं। कहते हैं कि इस पेड़ में ब्रह्मा, विष्णु व महेश तीनों देवताओं का वास होता है। इस दिन महिलाएं वट वृक्ष के नीचे बैठकर कथा पढ़ती है और वट वृक्ष को रक्षा सूत्र बांधती है। पूजा के बाद सौभाग्यवती महिला अपनी सास को वस्त्र और श्रृंगार का देकर उसके पैर छूकर आशीर्वाद लेती है। बहुत पहले की बात है अश्‍वपति नाम का एक सच्चा ईमानदार राजा था। उसकी सावित्री नाम की बेटी थी। जब सावित्री शादी के योग्‍य हुई तो उसकी मुलाकात सत्‍यवान से हुई। सत्‍यवान की कुंडली में सिर्फ एक वर्ष का ही जीवन शेष था। सावित्री पति के साथ बरगद के पेड़ के नीचे बैठी थी। सावित्री की गोद में सिर रखकर सत्‍यवान लेटे हुए थे। तभी उन
द्वितीय केदार मद्महेश्वर के खुले कपाट

द्वितीय केदार मद्महेश्वर के खुले कपाट

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धर्म (DiD News): द्वितीय केदार भगवान मद्महेश्वर मन्दिर के कपाट सोमवार को सुबह 11 बजे वैदिक मंत्रोच्चार व पौराणिक रीति रिवाजों के साथ खोल दिए गए हैं। अब छह माह भगवान की पूजा अर्चना मद्महेश्वर में ही होगी। वहीं लॉकडाउन के चलते प्रशासन ने सीमित लोगों को ही धाम जाने की अनुमति दी। सोमवार को सुबह छह बजे डोली गोंडार से रवाना हुई। 10 बजे देवदर्शनी  में पहुंचने के बाद कुछ ही देर में मंदिर परिसर पहुंची। यहां ठीक 11 बजे मन्दिर के कपाट खोल दिए गए। बीते शनिवार को शीतकालीन गद्दी स्थल ओंकारेश्वर मन्दिर उखीमठ से भगवान की चलविग्रह उत्सव डोली उच्च हिमालय क्षेत्र मद्महेश्वर धाम के लिए रवाना हुई थी। प्रथम पड़ाव रांसी व द्वितीय पड़ाव गोंडार में रात्रि विश्राम करने के बाद डोली मद्महेश्वर मन्दिर परिसर में पहुंची। सोमवार को सुबह 5 बजे गोंडार में पुजारी गंगाधर लिंग द्वारा भगवान का अभिषेक, श्रृंगार,भोग एवं पूज
ओंकारेश्वर मंदिर

ओंकारेश्वर मंदिर

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द्वितीय केदार मद्महेश्वर की डोली शनिवार को मद्महेश्वर धाम के लिए प्रस्थान करेगी। वहीं, 11 मई को मन्दिर के कपाट खोल दिए जाएंगे। परंपरा के अनुसार आज ओंकारेश्वर मंदिर से भगवान की डोली अपने पहले पड़ाव राकेश्वरी मन्दिर के लिए प्रस्थान करेगी।वैदिक मंत्रोच्चार के साथ रावल भीमाशंकर लिंग की उपस्थिति में गुरुवार को ओंकारेश्वर के गर्भगृह से भगवान की जागृत भोग मूर्ति को बाहर लाकर सभामंडप में विराजमान किया गया था। इसके बाद पुजारी गंगाधर लिंग द्वारा भगवान की पूजा संपन्न की गई। शुक्रवार को ओंकारेश्वर मंदिर में विश्राम के बाद आज डोली धाम के लिए रवाना होगी। वहीं, लॉकडाउन के मद्देनजर इस दौरान सीमित लोग ही रहेंगे। डोली रांसी के राकेश्वरी मन्दिर में पहुंचेगी। रविवार को रांसी से गोंडार एवं सोमवार को गोंडार से मद्महेश्वर के लिए रवाना होगी। जहां पर प्रात: 11 बजे मंदिर के कपाट खोल दिए जाएंगे।
भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा के लिए तैयारी शुरू

भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा के लिए तैयारी शुरू

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भगवान जगन्नाथ की वार्षिक रथ यात्रा के लिए रथ निर्माण का काम लॉकडाउन के बीच शुक्रवार को शुरू कर दिया गया। यह वार्षिक रथ यात्रा 23 जून से शुरू होनी है। अधिकारियों ने बताया कि जगन्नाथ मंदिर कार्यालय और श्री नहर महल के सामने ग्रैंड रोड पर दोनों ओर स्थित ‘रथ कला’ में निर्माण कार्य जारी है।उन्होंने बताया कि निर्माणस्थल पर अवरोधक लगा दिए गए हैं और प्रशासन के निर्देशानुसार उसे कपड़ों से ढक दिया गया है। सामाजिक दूरी के नियम का पालन किया जा रहा है। ‘रथ कला’ को भी निषिद्ध क्षेत्र घोषित कर दिया गया है।भगवान जगन्नाथ रथ के प्रमुख बढ़ई बिजय महापात्र ने बताया कि लॉकडाउन के दिशा-निर्देशों के तहत रथ का निर्माण किया जा रहा है। सामाजिक दूरी बनाए रखने के नियम का पालन किया जा रहा है और सभी लोग काम के समय मास्क भी पहनते हैं। उन्होंने बताया कि केन्द्र सरकार की ओर से ‘रथ कला’ में निर्माण गतिविधियां शुरू करने की अन
इस पावन व्रत के प्रभाव से बढ़ता है सौंदर्य

इस पावन व्रत के प्रभाव से बढ़ता है सौंदर्य

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वैशाख माह में शुक्‍ल पक्ष की एकादशी को मोहिनी एकादशी का व्रत किया जाता है। इस व्रत को लेकर मान्यता है कि समुद्र मंथन के समय भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण किया था। भगवान ने अपने मोहिनी रूप से असुरों को मोहपाश में बांध लिया और देवताओं को अमृत पान करा दिया था। इसी कारण इस एकादशी को मोहिनी एकादशी कहा जाता है। इस व्रत में सच्चे मन से भगवान विष्णु की अराधना करने से बैकुंठ की प्राप्ति होती है।यह पावन तिथि सभी पापों को हरने वाली है। भगवान विष्णु अपने भक्तों के सभी कष्टों को हर लेते हैं, इसीलिए उन्हें श्री हरि भी कहा जाता है। मोहिनी एकादशी का व्रत रखने से आकर्षण बढ़ता है और बुद्धि का विकास होता है। इस व्रत के प्रभाव से मान-सम्मान की प्राप्ति होती है। सौंदर्य का वरदान मिलता है। इस व्रत के प्रभाव से घर-परिवार में सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है। इस व्रत में भगवान विष्‍णु की पूजा करते समय तुलसी के पत
4 मई से खुलेगा केदारनाथ मंदिर

4 मई से खुलेगा केदारनाथ मंदिर

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उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने शनिवार को कहा कि राज्य के तीर्थयात्री चार मई से राज्य स्थित केदारनाथ एवं अन्य हिमालयी मंदिर जा सकते हैं। रावत ने कहा कि चार मई से लोगों को कुछ पाबंदियों के साथ अंतर जिला आवागमन की इजाजत दी जा रही है, विशेष तौर पर उन जिलों में जो ग्रीन जोन में पड़ते हैं। राज्य के तीर्थयात्री केदारनाथ जा सकते हैं।यद्यपि मुख्यमंत्री ने लोगों से कहा कि वे मंदिर में पूजा के दौरान एकदूसरे से दूरी बनाये रखने के नियम का पालन करें क्योंकि उनकी सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण है। केदारनाथ के कपाट लॉकडाउन की अवधि बढ़ने के चलते तीर्थयात्रियों की अनुपस्थिति में 29 अप्रैल को खुले थे। यह पूछे जाने पर कि उत्तराखंड के बाहर के श्रद्धालुओं को इन मंदिरों में दर्शन की कब छूट मिलेगी, रावत ने कहा कि कोविड-19 से उत्पन्न स्थिति बाधा बनी हुई है और सरकार चीजों के सामान्य होने का इंतजार कर
सीता नवमी

सीता नवमी

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हिन्दू पंचांग के अनुसार, माता सीता का प्राकट्य त्रेतायुग में वैशाख शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को हुआ था। इस बार सीता नवमी 2 मई को है। 1 मई को प्रात: 8.26 मिनट में नवमी तिथि प्रारंभ होगी जो दो मई को सुबह 6.37 मिनट तक रहेगी। आपको बता दें कि सीता जी को त्रेतायुग में लक्ष्मी का अवतार माना जाता है। भगवान शिव का धनुष तोड़कर विष्णुजी के अवतार श्रीराम ने स्वयंवर में सीता का वरण किया था। इसके बाद उन्होंने पतिव्रत धर्म निभाया और वनवास में भी अपने पति के साथ गईं। सीता नवमी पर उनकी पूजा विशेश लाभ दायी होती है। इस दिन मंदिरों में विशेष कीर्तन होते हैं। वहीं इस बार कोरोना वाययरस लॉकडाउन के कारण लोग घर पर रहकर ही माता सीता नवमी मनाएंगे और व्रत रखेंगे। सीता नवमी पर बहुत से लोग व्रत रखते हैं। ऐसा कहा जाता है कि इस दिन व्रत रखने से सभी तीर्थों के दर्शन का फल मिलता है। ऐसी भी मान्यता है कि इस दिन जो लोग व्रत रख
भगवान चित्रगुप्त जयंती

भगवान चित्रगुप्त जयंती

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धर्म (DiD News): परमपिता ब्रह्मा जी के अंश से उत्पन्न हुए भगवान चित्रगुप्त यमराज के सहयोगी हैं। इस बार इनकी जयंती 30 अप्रैल को मनाई जाएगी। यम द्वितीया के दिन मनाया जाने वाला यह पर्व कायस्थ वर्ग में अधिक प्रचलित है। उनके ईष्ट देवता भी चित्रगुप्त जी हैं।सृष्टि के निर्माण के उद्देश्य से जब भगवान विष्णु ने अपनी योग माया से सृष्टि की कल्पना की तो उनकी नाभि से एक कमल निकला जिस पर एक पुरुष आसीन था चूंकि इनकी उत्पत्ति ब्रह्मांड की रचना और सृष्टि के निर्माण के उद्देश्य से हुई थी अत: ये ब्रह्मा कहलाये। इन्होंने सृष्टि की रचना के क्रम में देव-असुर, गंधर्व, अप्सरा, स्त्री-पुरुष पशु-पक्षी को जन्म दिया। इसी क्रम में यमराज का भी जन्म हुआ जिन्हें धर्मराज की संज्ञा प्राप्त हुई क्योंकि धर्मानुसार उन्हें जीवों को सजा देने का कार्य प्राप्त हुआ था। धर्मराज ने जब एक योग्य सहयोगी की मांग ब्रह्मा जी से की
जगन्नाथ मंदिर में किया गया चंदन यात्रा उत्सव का आयोजन

जगन्नाथ मंदिर में किया गया चंदन यात्रा उत्सव का आयोजन

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धर्म ((DiD News): वैश्विक महामारी कोरोना वायरस 'कोविड-19' के मद्देनजर पूर्णबंदी के दौरान गुजरात में अहमदाबाद शहर के एतिहासिक भगवान जगन्नाथ मंदिर में दो लोगों की उपस्थिति में रविवार को चंदन यात्रा और अक्षय तृतीया उत्सव आयोजित किया गया। मंदिर के न्यासी महेन्द्रभाई झा ने यूनीवातार् को बताया कि कोरोना महामारी के कारण भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा से पहले पारंपरिक तौर पर आयोजित चंदनयात्रा आज केवल दो लोगों की उपस्थिति में ही संपन्न हुई। अहमदाबाद के जमालपुर स्थित मंदिर परिसर में भगवान जगन्नाथजी की रथयात्रा से पहले अखात्रीज यानी अक्षय त्रितीया के दिन रथ यात्रा की पहली पूजा की जाती है। महंत दिलीप दासजी महाराज और न्यासी महेंद्रभाई झा ने आज विधि-विधान से रथों की पूजा की।गांधीनगर के अडालज स्थित जगन्नाथ मंदिर में भी पूर्णबंदी के कारण वहां के महंत ने ही चंदन यात्रा पूजा की। रथयात्रा की तैयारी परंपराग
अक्षय तृतीया

अक्षय तृतीया

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अक्षय तृतीया पर इस बार बहुत शुभ योग बन रहे हैं। इस साल 25 अप्रैल दोपहर करीब बारह बजे से  तृतीया तिथि आरंभ होगी जो अगले दिन दोपहर करीब 1.20 मिनट तक रहेगी। इस बार अक्षय तृतीया पर  उदय व्यापिनी और रोहिणी नक्षत्र का संयोग है, जो इसे बहुत ही फलदायी बना रहे हैं। इस बहुत अच्छा मुहूर्त है। इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विधि पूर्वक पूजा की जाती है। कहा जाता है कि इस दिन शंख से की गई पूजा से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी बहुत प्रसन्न होते हैं। भगवान परशुराम जयंती भी इसी दिन मनाई जाती है। कहते हैं कि इस दिन दान करने सेअक्षय फल मिलता है। अक्षय का अर्थ होता है जिसका कभी नाश न हो। इस दिन अबूझ मुहूर्त भी होता है। कहते हैं कि इस दिन बिना मुहूर्त के बहुत से अच्छे कार्य किए जाते हैं। लेकिन फिलहाल देश में कोरोना वायरस संक्रमण के कारण लॉकडाउन है ऐसे में घर  में रहकर ही भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी को